Thursday, January 2, 2014

मैं

इक सालाना दस्तुरसा है
दस्तक होती है दरवज्ज़े पर
बाहर सन्नाटा रहता है
गुमनामसा बादल बहता है
मुड़कर अंदर देखू तो
'वो' शतरंज बिछाए हसता है
मैं आता जो सालाना हुँ
वो कहता मैं 'फ़लाना' हुँ
विल्स-माईल्ड के धुएँ तले
फिर शह-मातों का दौर चले
जिसकी भी हार यहाँपर हो
दुनिया पचड़े का कच्चा वो
बचा खुचा सब जुतीपर
जो जीतें जाए छुट्टीपर

हर साल मैं सोचुं पुछूंगा
यही सवाल मैं नोचूँगा

सवाल,शक,डर ऐसा है
दस्तुर ये जो सालाना है
'वो' दस्तकवाला जो आए
'वो' मैं हुँ या फ़लाना है

- प्राजक्त ७ जुन '१३

(फिर दस्तक होती दरवाज़े पर
बाहर सन्नाटा रहता है
गुमनामसा बादल बहता है
मुड़कर अंदर देखू तो
'वो' शतरंज बिछाए हसता है)

Monday, August 19, 2013

चोटें तय कर लेंगे हम


छोड ना ! फिर देखेंगे हम

पहले चल जी लेंगे हम

नइ की क्या है जल्दी
हां 'वही' उधेड देंगे हम

चल गिन लेते है सदमें
चोटें तय कर लेंगे हम

रुखसार पे चलते चलते
लब पे थोडे  'हो' लेंगे हम

हल तो पहोंच चुका ,अब
सवाल पहोचाएंगे हम

अांगन से कैसा शिकवा
घोसलेसे रुठेंगे हम

दिवारें भाव करे तो
दरवज्जोंसे तोलेंगे हम

गूडीगुडी कैसे है बजती
खाली पेटसे पुछेंगे हम

गुलजारजी निंद में है क्या
'इरशाद' ही हो लेंगे हम

अासमां की शमा बुझी है?
चल अपनीही दे देंगे हम

इसबार जो लैा बुझी,तो
तुफान उठा देंगे हम

बस 'वो' तिली हो जो,तो
हसहसके अैार घिसेंगे हम
- Prajakt
.

नंतर बघून घेऊ
ये आधी जगुन घेऊ..!!

नकोच नवे बहाणे
जुने उसवुन घेऊ..!!

मोजुन ठेव जखमा
घाव ठरवुन घेऊ..!!

गाली ओघळलो तर
ओठी सरकुन घेऊ..!!

उत्तर पाठ आहे
प्रश्न समजुन घेऊ..!!

अंगण तेच असुदे
घरटे तरुण घेऊ..!!

उठतील मग भिंती
दार बसवुन घेऊ...!!

लागते झोप उपाशी
भूक बदलुन घेऊ..!!

या फ़ुलांना जाग नाही
चल उमलुन घेऊ..!!

आभाळाचे दोन दिवे
एक उचलुन घेऊ..!!

दिव्यास तेल नाही
नसु देत, ऊन घेऊ..!!

हरएक आपलाही
क्षण उजळुन घेऊ..!!
 -Sachin Kakde



Wednesday, July 31, 2013

उतना मिले तो झोपडोंमे दावतोंका हुक्म हो
प्लेटमें लेते हुए जितना गीरा था लॉनपर

- प्राजक्त

Wednesday, July 24, 2013

कोलाज २३

तुमने कहा रात ,
मैंने सुरज को फुंकसे बुझा दिया
तुमने कहा दिन तो,
चांद पे घासलेट छिडककर दिन भी उगा दिया

तुमने बारिश कहा तो
अासमां निचोडा 
अौर धुप कहा जब
बादल खदेडा

तुने अासमां कहा तो 
जमीं के अारपार सुराख खोंदा ,
कि  परला अासमां दिखा दिया

अौ' जमीं कही तो
अासमां के मत्थेपे मिट्टीका तिलक जमा दिया  


तु मौत कह दे ,
मै नब्जोंको अकड लुं
यारा , तु बस जिंदगी कह दे 
मै मौत का गिरेबां पकड लुं

- प्राजक्त १९ जुलै १३

Tuesday, July 23, 2013


तेरी याद नब्ज होती तो ठिक होता

ये रात बनी बैठी है, कटती नही

Monday, July 22, 2013

पेचों-खम

जिंदगीभर कोइ गम तो ढो ता नही 
जख्म धो भी लेगा की दर्द धोता नही

खुदको कोस कर कहा मैने अपने अापसे
इसकदर कोइ अपनी जान खोता नही

हंस के उसने ब्याह का जिक्र सामने किया
हथेलीपे रखा कफन कोइ न्योता नही

तसल्लीके लिए ही बस कारीगर टिक गया
हरकोइ तख्तपर सुल्तान होता नही

अमन की चाह है तो,यार इश्क का सबक तु रट
खुदा के नाम पर कोइ खौफ बोता नही

ठोकरोंसे तर-ब-तर है हमारे पेचों-खम
हम तो सो जाएंगे ख्वाब सोता नही

उपज उपज के ये जमीं बंजरसी हो गइ
अाजकल याद में मैं भी रोता नहीं

- प्राजक्त ।२०।७।२०१३

Friday, July 19, 2013

कधी

कधी उंचशा आभाळातुन, रिमझिमणारा श्रावण होते
कधी तारका वीजेत गुंफून, लुकलुकणारे पैंजण होते 

खडा शांतशा तळ्यात अन तु, गोल गोल राणी होते

कधी उकळती कढई चुकले ,तडतडणारे पाणी होते 

कधी एकांती पोकळवेळी,अस्पष्ट हळुचशी कुजबुज होते

कधी गर्दीच्या झुंबडवेळी,स्पष्ट ठळकशी अलगूज होते

लाळ टपकत्या सभेत तन्मय, लज्जारक्षण धावा होते

कधी सावळ्या ओठांखाली, सांजभुलीचा पावा होते 

कधी कलंडती रंगबादली,विस्कटलेले आभाळ होते

कधी कुडकुडत्या थंडीमध्ये,वाफ बोलकी सकाळ होते

कधी थांबल्या ओळीवरती, टोक मुडपले पान होते

कधी छातीला खोपा पुस्तक,घसरुन दचकते भान होते 

कधी वेडसर डोळ्यांमधली,स्थिरबाहुली तंद्री होते

भिवईमध्ये नटुन बसता,चित्त पछाडुन ‘चंद्री’ होते


तु नसल्याची जाणीव..


- प्राजक्त

अवघ्या महाराष्ट्राची ‘संगीत देवबाभळी’ - (सामना)

  मराठी रंगभूमीने नेहमीच मेहनत आणि प्रतिभेची कदर केलेली आहे. कलावंत नेहमीच बैरागी पंथातला असतो. कारण आपल्या कलेच्या पलीकडे त्याला काहीच महत...